प्रेमा - 'तो मैं भी अपना हृदय कठोर बना लूँगी।'

प्रेमा ने हारमोनियम सँभाला और पूर्णा गाने लगी।


अध्याय 2

काशी के आर्य-मंदिर में पंडित अमरनाथ का व्याख्यान हो रहा था। श्रोता लोग मंत्रमुग्ध से बैठे सुन रहे थे। प्रोफेसर दाननाथ ने आगे खिसक कर अपने मित्र बाबू अमृतराय के कान में कहा - 'रटी हुई स्पीच है।' अमृतराय स्पीच सुनने में तल्लीन थे। कुछ जवाब न दिया।

अमृतराय ने फिर भी कुछ जवाब न दिया। एक क्षण के बाद दाननाथ ने फिर कहा - 'भाई, मैं तो जाता हूँ।'

दाननाथ - 'तुम कब तक बैठे रहोगे?'

दाननाथ - 'बस, हो निरे बुद्धू, अरे स्पीच में है क्या? रट कर सुना रहा है।'

दाननाथ - 'अजी घंटों बोलेगा। राँड़ का चर्खा है या स्पीच है।'

दाननाथ - 'पछताओगे। आज प्रेमा भी खेल में आएगी।'

दाननाथ - 'मुझे क्या गरज पड़ी है जो आपकी तरफ से क्षमा माँगता फिरूँ।'


10 of 180

देश में फूट बढ़ती है। ऐसे ही एक और जाँगलू आ कर कह गया, चमारों-पासियों को भाई समझना चाहिए। उनसे किसी तरह का परहेज न करना चाहिए। बस, सब-के-सब, बैठे-बैठे यही सोचा करते हैं कि कोई नई बात निकालनी चाहिए। बुड्ढे गांधी जी को और कुछ न सूझी तो स्वराज्य ही का डंका पीट चले। सबों ने बुद्धि बेच खाई है।'

पूर्णा को देखते ही प्रेमा दौड़ कर उसके गले से लिपट गई। पड़ोस में एक पंडित वसंत कुमार रहते थे। किसी दफ्तर में क्लर्क थे। पूर्णा उन्हीं की स्त्री थी,


10 of 297