अभी एक हफ्ता बाकी है। घर-घर जाऊँगा। पिता जी ने मुकाबले में कमर बाँध ली है। वह तो पहले ही सोच रहे थे कि इन विधर्मियों का रंग फीका करना चाहिए, लेकिन कोई अच्छा बोलने वाला नजर न आता था। अब आपके सहयोग से तो हम सारे शहर को हिला सकते हैं। अभी एक हजार लठैत तैयार हैं, पूरे एक हजार। जिस दिन महाशय जी की अपील होगी चारों तरफ रास्ते बंद कर दिए जाएँगे। कोई जाने ही न पाएगा। बड़े-बड़ों को तो हम ठीक कर लेंगे और ऐरे-गैरों के लिए लठैत काफी हैं। अधिकांश पढ़े-लिखे आदमी ही तो उनके सहायक हैं। पढ़े-लिखे आदमी लड़ाई-झगड़े के करीब नहीं जाते। हाँ, कल एक स्पीच तैयार रखिएगा। इससे बढ़ कर हो। उधर उनका जलसा हो, इधर उसी वक्त हमारा जलसा भी हो। फिर देखिए क्या गुल खिलता है।'
कमलाप्रसाद हाकिम-जिला का नाम सुन कर जरा सिटपिटा गए। कुछ
का आधार थी। विलासिता महँगी वस्तु है। जेब के रुपए खर्च करके भी किसी आफत में फँस जाने की जहाँ प्रतिक्षण संभावना हो, ऐसे काम में कमलाप्रसाद जैसा चतुर आदमी न पड़ सकता था। पूर्णा के विषय में कोई भय न था। वह इतनी सरल थी कि उसे काबू में लाने के लिए किसी बड़ी साधना की जरूरत न थी और फिर यहाँ तो किसी का भय नहीं, न फँसने का भय, न पिट जाने की शंका। अपने घर ला कर उसने शंकाओं को निरस्त कर दिया था। उसने समझा था, अब मार्ग में कोई बाधा नहीं रही।