सोच कर बोले - 'हुक्काम उनकी पीठ भले ही ठोंक दें, पर रुपए देनेवाले जीव नहीं हैं। पाएँ तो उल्टे बाबू साहब को 'मूँड़' लें। हाँ, क्लेक्टर साहब का मामला बड़ा बेढब है। मगर कोई बात नहीं। दादाजी से कहता हूँ - आप शहर के दस-पाँच बड़े-बड़े रईसों को ले कर साहब से मिलिए और उन्हें समझाइए कि अगर आप इस विषय में हस्तक्षेप करेंगे, तो शहर में बलवा हो जाएगा।'
प्रेमा ये बातें सुन कर पहले ही से भरी बैठी थी। यह प्रश्न चिनगारी का काम कर गया, मगर कहती क्या? दिल में ऐंठ कर रह गई। बोली - 'मैं इन झगड़ों में नहीं पड़ती। आप जानें और वह जानें। मैं दोनों तरफ का तमाशा देखूँगी। कहिए, अम्माँ जी तो कुशल से हैं। भाभीजी आजकल क्यों रूठी हुई हैं? मेरे पास कई दिन हुए एक खत भेजा था कि मैं बहुत जल्द मैके चली जाऊँगी।'
कमलाप्रसाद चला गया। दाननाथ भी उनके साथ बाहर आए और दोनों बातें करते हुए बड़ी दूर तक चले गए।
केवल घरवालों की आँख बचा लेना काफी था और यह कुछ कठिन न था, किंतु यहाँ भी एक बाधा खड़ी हो गई और वह सुमित्रा थी।
सुमित्रा ने कहा - 'अकेली पड़ी-पड़ी क्या करूँ? फिर यह भी तो अच्छा नहीं लगता कि मैं आराम से सोऊँ और वह अकेली रोया करे। उठना भी चाहती हूँ, तो चिमट जाती है, छोड़ती ही नहीं। मन में मेरी बेवकूफी पर हँसती है या नहीं यह कौन जाने; मेरा साथ उसे अच्छा न लगता हो, यह बात नहीं।'
'मैं ऐसा नहीं समझती।'
'ऐसी समझ का न होना ही अच्छा है।'