दाननाथ - 'इसी वक्त! कम-से-कम एक बजे तक होगा। नहीं साहब, आप जाएँ, मैं जाता हूँ।'

दाननाथ - 'नहीं भाई साहब, माफ कीजिए। बेचारी औरतें मेरी राह देखती बैठी रहेंगी।

दाननाथ ने दो-चार बार मना किया, मगर कमलाप्रसाद ने न छोड़ा। दोनों ने मैनेजर के घर भोजन किया और सिनेमा-हाल में जा बैठे, मगर दाननाथ को जरा भी आनंद न आता था। उनका दिल घर की ओर लगा था। प्रेमा बैठी होगी - अपने दिल में क्या कहती होगी? घबरा रही होगी। बुरा फँसा। कमलाप्रसाद बीच-बीच में कहता जाता था - यह देखो चैपलिन आया - वाह-वाह! क्या कहने हैं पट्ठे, तेरे दम का जमूड़ा है - अरे यार, किधर देख रहे हो, जरा इस औरत को देखो, सच कहता हूँ, यह मुझे पानी भरने को नौकर रख ले, तो रह जाऊँ-वाह! ऐसी-ऐसी परियाँ भी दुनिया में हैं। एक हमारा देश खूसट है, तुम तो सो रहे हो जी।'


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कमलाप्रसाद के चरित्र में अब एक विचित्र परिवर्तन होता जाता था। नौकरों पर डाँट-फटकार भी कम हो गई। कुछ उदार भी हो गया। एक दिन बाजार से बंगाली मिठाई लाए और सुमित्रा को देते हुए कहा - 'जरा अपनी सखी को भी चखाना। सुमित्रा ने मिठाई ले ली; पर पूर्णा से उसकी चर्चा तक न की।' दूसरे दिन कमलाप्रसाद ने पूछा - 'पूर्णा ने मिठाई पसंद की होगी?' सुमित्रा ने कहा - 'बिल्कुल नहीं, वह तो कहती थी, मुझे मिठाई से कभी प्रेम न रहा।'

कमलाप्रसाद ने कहा - 'अरे!


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