प्रेमा ने कहा - 'बड़ी जल्दी लौटे, अभी ग्यारह ही तो बजे हैं।'
प्रेमा ने तिनक कर कहा - 'झूठ मत बोलो, भाई साहब पकड़ ले गए। उन्होंने कहा होगा, चलो जी जरा सिनेमा देख आएँ, तुमने एक बार तो नहीं की होगी, फिर चुपके से चले गए होंगे। जानते तो थे ही, लौंडी बैठी रहेगी।'
प्रेमा - 'जी, ऐसे ही बड़े शीलवान तो हैं आप, यह क्यों नहीं कहते कि वहाँ की बहार देखने को जी ललच उठा।'
प्रेमा - 'उन्हें तो भोजन करके सुला दिया। इस वक्त जागती होतीं, तो तुमसे डंडों से बातें करतीं। सारी शरारत भूल जाते।'
प्रेमा - 'सिखा रहे हो, तो वह भी सीख लूँगी। भैया से मेल हुआ है, तो मेरी दशा भी भाभी की-सी हो कर रहेगी।'
प्रेमा - 'और तुम?'
प्रेमा - 'तो मैं भी कर चुकी।'
प्रेमा ने न माना। दाननाथ को खिला कर ही छोड़ा, तब खुद खाया। दाननाथ आज बहुत प्रसन्न थे।
पूर्णा भी यहीं है। क्षमा करना पूर्णा, मुझे मालूम न था। यह देखो सुमित्रा दो साड़ियाँ लाया हूँ। सस्ते दामों में मिल गईं। एक तुम ले लो, एक पूर्णा को दे दो।'
पूर्णा ने सिर हिला कर कहा - 'नहीं, मैं रेशमी साड़ी ले कर क्या करूँगी।'
सुमित्रा - 'छूत की चीज नहीं; पर शौक की चीज तो है। सबसे पहले तो तुम्हारी पूज्य माताजी ही छाती पीटने लगेंगी।'
सुमित्रा - 'बहुत अच्छी हैं, तो प्रेमा के पास भेज दूँ। तुम्हारी बेसाही हुई साड़ी पा कर अपना भाग्य सराहेगी। मालूम होता है, आजकल कहीं