जमीन देने से इनकार कर दिया है। ईंट-पत्थर अपने घर में भर रखे हैं बस कॉलेजों के थोड़े-से विद्यार्थी रह गए हैं, सो उनका किया क्या हो सकता है? दाननाथ इन खबरों को प्रेमा से छिपाना चाहते थे, पर कमलाप्रसाद को कब चैन आता था। वह चलते वक्त संक्षिप्त रिपोर्ट उसे भी सुना देते।
दाननाथ ने उदासीन भाव से कहा - 'मुझे ले जा कर क्या कीजिएगा। आप लोग तो हैं ही।'
दाननाथ - 'अभी मेरा व्याख्यान तैयार नहीं हुआ है। उधर गया, तो फिर अधूरा ही रह जाएगा।'
यह कहते हुए कमलाप्रसाद अंदर चले गए। प्रेमा आज की रिपोर्ट सुनने के लिए उत्कंठित हो रही थी। बोली - 'आइए भैयाजी, आज तो समर का दिन है।'
प्रेमा - 'मार-पीट न होगी?'
प्रेमा को बड़ी चिंता हुई। जहाँ इतने विरोधी जमा होंगे, वहाँ दंगा हो जाने की प्रबल संभावना थी। कहीं ऐसा न हो कि मूर्ख जनता उन पर ही
को अप्रसन्न करके यहाँ एक दिन भी निबाह नहीं हो सकता, यह वह जानती थी। इसलिए वह सुमित्रा को समझाती रहती थी। बोली - 'मैं तो बराबर समझाया करती हूँ, बाबूजी पूछ लीजिए झूठ कहती हूँ?'
कमलाप्रसाद - 'तुम व्यर्थ बात बढ़ाती हो, सुमित्रा! मैं यह कब कहता हूँ कि तुम इनके साथ उठना-बैठना छोड़ दो, मैंने तो ऐसी कोई बात नहीं कही।'
कमलाप्रसाद - 'कुछ झूठ कह रहा हूँ? पूर्णा खुद देख रही हैं। तुम्हें उनके सत्संग से कुछ शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए थी। इन्हें यहाँ