टूट पड़े। क्या उन्हें इन बातों की खबर नहीं है? सारे शहर में जिस बात की चर्चा हो रही है, क्या वह उनके कानों तक न पहुँची होगी? उनके भी तो कुछ-न-कुछ सहायक होंगे ही। फिर वह क्यों इस जलसे को स्थगित नहीं कर देते? क्यों अपनी जान के दुश्मन हुए हैं? आज इन लोगों को जलसा कर लेने दें। जब ये लोग जरा ठंडे हो जाएँ, तो दो-चार महीने बाद अपना जलसा करें, मगर वह तो हठी जीव हैं। आग में कूदने का तो उन्हें जैसे मरज है। क्या मेरे समझाने से वह मान जाएँगे? कहीं ऐसा तो न समझेंगे कि यह भी अपने पति का पक्ष ले रही है।
चार बजे। दाननाथ अपने जत्थे के साथ अपने जलसे में शरीक होने चले। प्रेमा को उस समय अपनी दशा पर रोना आया। ये दोनों मित्र जिनमें दाँत-काटी रोटी थी, आज एक-दूसरे के शत्रु रहे हैं और मेरे कारण। अमृतराय से पहले मेरा परिचय न होता तो आज
लाने का मेरा एक उद्येश्य यह भी था। मगर तुम्हारे ऊपर इनकी सोहब्बत का उल्टा ही असर हुआ। यह बेचारी समझाती होगीं, मगर तुम क्यों मानने लगीं। जब तुम मुझी को नहीं गिनतीं, तो वह बेचारी किस गिनती की हैं। भगवान सब दुःख दे, पर बुरे का संग न दे। तुम इनमें से एक साड़ी रख लो पूर्णा, दूसरी मैं प्रेमा के पास भेजे देता हूँ।'
कमलाप्रसाद - 'इनकी करतूतें देखती जाओ! इस पर मैं ही बुरा हूँ, मुझी में जमाने-भर के दोष हैं।'
कमलाप्रसाद - 'मैं तुम्हें तो नहीं देता।'