माता - 'दानू बेचारा भोला है। उनकी बातों में आ गया।'

मगर ताँगे का घोड़ा दिन-भर का थका हुआ था, कहाँ तक दौड़ता? कोचवान बार-बार चाबुक मारता था, पर घोड़ा गर्दन हिला कर रह जाता था। टाउन हॉल आते-आते बीस मिनट लग गए। दोनों महिलाएँ जल्दी से उतर कर हॉल के अंदर गईं, तो देखा कि अमृतराय मंच पर खड़े हैं और सैकड़ों आदमी नीचे खड़े शोर मचा रहे हैं। महिलाओं के लिए एक बाजू में चिकें पड़ी हुई थीं। दोनों चिक की आड़ में आ खड़ी हुईं। भीड़ इतनी थी और इतने शोहदे जमा थे कि प्रेमा को मंच की ओर जाने का साहस न हुआ।

कई आदमियों ने चिल्ला कर कहा - 'धर्म का द्रोही है।'

कई आवाजें - 'और क्या हो तुम? बताओ कौन-कौन से वेद पढ़े हो?'

अमृतराय ने फिर कहा - 'मैं जानता हूँ, कुछ लोग यहाँ सभा की कार्यवाही में विघ्न डालने का निश्चय करके आए हैं। जिन लोगों ने उन्हें सिखा-पढ़ा कर भेजा है, उन्हें मैं जानता हूँ।'


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अध्याय 9

साड़ियाँ लौटा कर और कमलाप्रसाद को अप्रसन्न करके भी पूर्णा का मनोरथ पूरा न हो सका। वह उस संदेह को जरा भी न दूर कर सकी, जो सुमित्रा के हृदय पर किसी हिंसक पशु की भाँति आरूढ़ हो गया था। बेचारी दोनों तरफ से मारी गई। कमलाप्रसाद तो नाराज हो ही गया था, सुमित्रा ने भी मुँह फुला लिया। पूर्णा ने कई बार इधर-उधर की बातें करके उसका मन बहलाने की चेष्टा की; पर जब सुमित्रा की त्योरियाँ बदल गईं; और उसने झिड़क कर कह दिया - इस वक्त मुझसे


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