अमृतराय के पक्ष के एक युवक ने झल्ला कर कहा - 'आपको यदि यहाँ रहना है, तो शांत हो कर व्याख्यान सुनिए, नहीं तो हॉल से चले जाइए।'
अमृतराय ने जोर से कहा - 'क्या आप लोग फसाद करने पर तुले हुए हैं? याद रखिए, अगर फसाद हुआ, तो इसका दायित्व आपके ऊपर होगा।'
इस पर फिर चारों ओर तालियाँ पड़ीं, और कहकहों ने हॉल की दीवारें हिला दीं।
महिला ने प्रकंपित स्वर में कहा - 'सज्जनो, आपके सम्मुख आपकी बहन-आपकी कन्या खड़ी आपसे एक भिक्षा माँग रही है। उसे निराश न कीजिएगा...'
महिला - 'मैं आपके शहर के रईस लाला बदरीप्रसाद की कन्या हूँ और इस नाते से आपकी बहन और बेटी हूँ। ईश्वर के लिए बैठ जाइए। बहन को क्या अपने भाइयों से इतनी याचना करने का भी अधिकार नहीं है? यह सभा आज इसलिए की गई है कि आपसे इस नगर में एक ऐसा स्थान
कुछ न कहो पूर्णा, मुझे कोई बात नहीं सुहाती। मैं जन्म से ही अभागिनी हूँ, नहीं तो इस घर में आती ही क्यों? तुम आती ही क्यों! तुम आईं, तो समझी थी और कुछ न होगा, तो रोना ही सुना दूँगी, पर बात कुछ और ही हो गई। तुम्हारा कोई दोष नहीं है, यह तो सब मेरे भाग्य का दोष है। इस वक्त जाओ, मुझे जरा एकांत में रो लेने दो - तब पूर्णा को वहाँ से उठ जाने के सिवा और कुछ सूझ न पड़ा। वह धीरे से उठ कर दबे पाँव अपने कमरे में चली गई। सुमित्रा एकांत में रोई हो,