दाननाथ इतनी आसानी से छोड़ने वाले आदमी न थे। घड़ी निकाल कर देखी, पहलू बदला और अमरनाथ की ओर देखने लगे। उनका ध्यान व्याख्यान पर नहीं, पंडित जी की दाढ़ी पर था। उसके हिलने में उन्हें बड़ा आनंद आया। बोलने का मर्ज था। ऐसा मनोरंजक दृश्य देख कर वह चुप कैसे रहते? अमृतराय का हाथ दबा कर कहा - 'आपकी दाढ़ी कितनी सफाई से हिल रही है, जी चाहता है, नोच कर रख लूँ।'

अमरनाथ जी ने कहा - 'मैं आपके सामने व्याख्यान देने नहीं आया हूँ।'

अमरनाथ - 'बातें बहुत हो चुकीं, अब काम करने का समय है।'

अमरनाथ - 'आप लोगों में जिन महाशयों को पत्नी-वियोग हो चुका है, वह कृपया हाथ उठाएँ।'

अमरनाथ - 'आप लोगों में कितने महाशय ऐसे हैं, जो वैधव्य की भँवर में पड़ी हुई अबलाओं के साथ अपने कर्तव्य का पालन करने का साहस रखते हैं। कृपया वे हाथ उठाए रहें।'


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बहुत ही सुंदर, बहुत ही सुशील। घर में दूसरा कोई न था। जब दस बजे पंडित जी दफ्तर चले जाते, तो यहीं चली आती और दोनों सहेलियाँ शाम तक बैठी हँसती-बोलती रहतीं। प्रेमा को इतना प्रेम था कि यदि किसी दिन वह किसी कारण से न आती तो स्वयं उसके घर चली जाती। आज वसंत कुमार कहीं दावत खाने गए थे। पूर्णा का जी उब उठा, यहाँ चली आई। प्रेमा उसका हाथ पकड़े हुए ऊपर अपने कमरे में ले गई।

प्रेमा - 'भैया में किसी तरफ ताकने की लत नहीं है। यही तो उनमें एक गुण है। पतिदेव कहीं गए हैं क्या?'


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