वह किसी चीज को इतना मूल्यवान समझती है। आप सभी सज्जनों के कन्याएँ और बहनें होंगी। क्या उनके प्रति आपका कोई कर्तव्य नहीं है? और आप लोगों में ऐसा एक भी पुरुष है, जो इतना पाषाण हृदय हो, मैं यह नहीं मान सकती। यह कौन कह सकता है कि अनाथों की जीव-रक्षा धर्म-विरुद्ध है? जो यह कहता है वह धर्म के नाम को कलंकित करता है। दया धर्म का मूल है। मेरे भाई बाबू अमृतराय ने ऐसा एक स्थान बनवाने का निश्चय किया है। वह अपनी सारी संपत्ति उस पर अर्पण कर चुके हैं। अब वह इस काम में आपकी मदद माँग रहे हैं। जिस आदमी के पास कल लाखों की जायजाद थी, आज भिखारी बन कर आपसे भिक्षा माँग रहा है। आपमें सामर्थ्य हो तो भिक्षा दीजिए। न सामर्थ्य हो तो कह दीजिए - भाई, दूसरा द्वार देखो, मगर उसे ठोकर तो न मारिए, उसे गालियाँ तो न दीजिए। यह व्यवहार आप जैसे पुरूषों को शोभा नहीं देता।'


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उससे अगर भूल हुई, तो यही कि वह वहाँ आने पर राजी हो गई; लेकिन करती क्या; और अवलंब ही क्या था? कोई आगे-पीछे नजर भी तो नहीं आता था! आखिर जब इन्हीं लोगों का दिया खाती थी,तो यहाँ आने में कौन-सी बाधा थी? जब से वह यहाँ आई, उसने कभी कमलाप्रसाद से बातचीत नहीं की। फिर कमलाप्रसाद ने उसके लिए रेशमी साड़ी क्यों ली? वह तो एक ही कृपण हैं, उदारता उनमें कहाँ से आ गई? सुमित्रा ने भी तो साड़ियाँ न माँगी थीं। अगर उसके लिए साड़ी लानी थी, तो मेरे लिए लाने


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