दूसरे सज्जन बोले - 'और बाबू दाननाथ भी तो हैं?'
एक मोटे ताजे पगड़ी वाले आदमी ने कहा - 'और जो हम कमलाप्रसाद बाबू से पुछाय देई? हमका इहाँ का लेबे का रहा जौन औतेन, वही लोग भेजेन रहा, तब आयन।'
प्रेमा ने इसी तरह कोई आध घंटे तक अपनी मधुर वाणी, अपने निर्भय सत्य प्रेम और अपनी प्रतिभा से लोगों को मंत्र-मुग्ध रखा। उसका आकस्मिक रूप से मंच पर आ जाना जादू का काम कर गया। महिला का अपमान करना इतना आसान न था, जितना अमृतराय का। पुरुष का अपमान एक साधारण बात है। स्त्री का अपमान करना, आग में कूदना है । फिर स्त्री कौन? शहर के प्रधान रईस की कन्या। लोगों के विचारों में क्रांति-सी हो गई। जो विघ्न डालने आए थे, वे भी पग उठे। जब प्रेमा ने चंदे के लिए प्रार्थना करके अपना आँचल फैलाया, तो वह दृश्य सामने आया, जिसे देख कर देवता भी प्रसन्न
की क्या जरूरत थी? मैं उसकी ननद नहीं, देवरानी नहीं, जेठानी नहीं, केवल आसरैत हूँ।
लेकिन इस घर को त्याग देने का संकल्प करके भी पूर्णा निकल न सकी? कहाँ जाएगी? जा ही कहाँ सकती है? इतनी जल्दी चला जाना क्या इस लाँछन को और भी सुदृढ़ न कर देगा। विधवा पर दोषारोपण करना कितना आसान है। जनता को उसके विषय में नीची-से-नीची धारणा करते देर नहीं लगती, मानो कुवासना ही वैधव्य की स्वाभाविक वृत्ति है, मानो विधवा हो जाना मन की सारी दुर्वासनाओं, सारी दुर्बलताओं का उमड़ आना है। पूर्णा केवल करवट बदल कर रह गई।