हो जाते। सबसे बड़ी रकमें उन गुंडों ने दीं, जो यहाँ लाठी चलाने आए थे, गुंडे अगर किसी की जान ले सकते हैं, तो किसी के लिए जान भी दे सकते हैं। उनको देख कर बाबुओं को भी जोश आया। जो केवल तमाशा देखने आए थे, वे भी कुछ-न-कुछ दे गए। जन-समूह विचार से नहीं, आवेश से काम करता है। समूह में ही अच्छे कामों का नाश होता है और बुरे कामों का भी। कितने मनुष्य तो घर से रुपए लाए। सोने की अंगूठियों, ताबीजों और कंठों का ढेर लग गया, जो गुंडों की कीर्ति को उज्ज्वल कर रहा था। दस-बीस गुंडे तो प्रेमा के चरण छू कर घर गए। वे इतने प्रसन्न थे, मानो तीर्थ करके लौटे हों।
प्रेमा ने हँस कर कहा - 'जब इन उजड्डों को मना लिया, तो उन्हें भी मना लूँगी।'
प्रेमा ने कठोर हो कर कहा- 'अपने ही हाथों तो।'
अध्याय 11
पूर्णा प्रातःकाल और दिनों से आध घंटा पहले उठी। उसने
बारह बजे के पहले तो कमलाप्रसाद कभी अंदर सोने न आते, लेकिन आज एक बज गया, दो बज गए, फिर भी उनकी आहट न मिली। यहाँ तक कि तीन बजे के बाद उसके कानों में द्वार बंद होने की आवाज सुनाई पड़ी। सुमित्रा ने अंदर से किवाड़ बंद कर लिए थे। कदाचित अब उसे भी आशा न रही, पर पूर्णा अभी तक प्रतीक्षा कर रही थी। यहाँ तक कि शेष रात भी इंतजार में कट गई। कमलाप्रसाद नहीं आए।
पूर्णा सारे दिन कमलाप्रसाद से दो-चार बातें करने का अवसर खोजती रही,