दबे पाँव सुमित्रा के कमरे में कदम रखा। वह देखना चाहती थी कि सुमित्रा सोती है या जागती। शायद वह उसकी सूरत देख कर निश्चय करना चाहती थी कि उसे रात की घटना की कुछ खबर है अथवा नहीं। सुमित्रा चारपाई पर पड़ी कुछ सोच रही थी। पूर्णा को देख कर वह मुस्करा पड़ी। मुस्कराने की क्या बात थी, यह तो वह जाने, पर पूर्णा का कलेजा सन्न-से हो गया। चेहरे का रंग उड़ गया। भगवान, कहीं इसने देख तो नहीं लिया?

प्रश्न बिल्कुल साधारण था, किंतु पूर्णा को ऐसा जान पड़ा कि यह उस मुख्य विषय की भूमिका है। इतने सबेरे जाग जाना ऐसा लांछन था, जिसे स्वीकार करने में किसी भयंकर बाधा की शंका हुई। बोली - 'क्या बहुत सबेरा है? रोज ही की बेला तो है।'

पूर्णा का कलेजा धक-धक करने लगा। यह दूसरा और पहले से भी बड़ा लांछन था। इसे वह कैसे स्वीकार कर सकती थी? बोली - 'नहीं


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पर वह घर में आए ही नहीं और मर्दानी बैठक में वह स्वयं संकोच-वश न जा सकी। आज इच्छा न रहते हुए भी उसे भोजन करना पड़ा। उपवास करके लोगों को मनमानी आलोचनाएँ करने का अवसर वह क्यों देती?

पूर्णा ने मुस्करा कर कहा - 'मैं चलूँगी, यहाँ अकेली कैसे रहूँगी?'

पूर्णा ने बात बनाई - 'बेचारे आ कर लौट गए होंगे।'

पूर्णा - 'मना लेने में कोई बड़ी हानि तो न थी?'

पूर्णा - 'तुम तो हँसी उड़ाती हो। पति किसी कारण रूठ जाए, तो क्या उसे मनाना स्त्री का धर्म नहीं है?'


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