बहन, तुम्हें भ्रम हो रहा है। रात बहुत सोई। एक ही नींद में भोर हो गया। बहुत सो जाने से भी आँखें लाल हो जाती हैं।'
पूर्णा ने जोर दे कर कहा - 'वाह! इतनी बात तुम्हें मालूम नहीं। तुम्हें अलबत्ता नींद नहीं आई। क्या सारी रात जागती रहीं?'
पूर्णा - 'तुम तो व्यर्थ का मान किए बैठी हो बहन! एक बार चली क्यों नहीं जाती?'
यह कहते-कहते उसे रात का अपमान याद आ गया। वह घंटों द्वार पर खड़ी थी। वह जागते थे - अवश्य जागते थे, फिर भी किवाड़ न खोले। त्योरियाँ चढ़ा कर बोली - 'फिर क्यों मनाने जाऊँ? मैं किसी का कुछ नहीं जानती। चाहे एक खर्च किया, चाहे सौ, मेरे बाप ने दिए और अब भी देते जाते हैं। इनके घर में पड़ी हूँ, इतना गुनाह अलबत्ता किया है। आखिर पुरुष अपनी स्त्री पर क्यों इतना रोब जमाता है? बहन, कुछ तुम्हारी समझ में आता है?'
सुमित्रा - 'रक्षा की है
पूर्णा - 'तुम्हीं अपने दिल से सोचो।'
पूर्णा ने जरा भौहें चढ़ा कर कहा - 'बहन, तुम कैसी बातें करती हो? एक तो ब्राह्मणी, दूसरे विधवा, फिर नाते से बहन, मुझे वह क्या कुदृष्टि से देखेंगे? फिर उनका कभी ऐसा स्वभाव नहीं रहा।'
पूर्णा - 'तो आज क्यों नहीं बीमार पड़ जातीं।'
पूर्णा - 'बड़ी निर्दयी हो बहन, आज चली जाना, तुम्हें मेरी कसम।'
दस-बारह दिन बीत गए थे। एक दिन आधी रात के बाद पूर्णा को सुमित्रा के कमरे का द्वार खुलने की आहट मिली। उसने समझा,