तो अपने स्वार्थ से, कुछ इसलिए नहीं कि स्त्रियों के प्रति उनके भाव बड़े उदार हैं। अपनी जायदाद के लिए संतान की जरूरत न होती, तो कोई स्त्री की बात भी न पूछता। जो स्त्रियाँ बाँझ रह जाती हैं, उनकी कितनी दुर्दशा होती है रोज ही देखती हो। हाँ, लंपटों की बात छोड़ो, जो वेश्याओं पर प्राण देते हैं।'
सुमित्रा - 'वह निकम्मे पुरुष होंगे।'
पूर्णा - 'यह तो संसार की प्रथा ही है, बहन। मर्द स्त्री से बल में, बुद्धि में, पौरुष में अक्सर बढ़ कर होता है, इसीलिए उसकी हुकूमत है। जहाँ पुरुष के बदले स्त्री में यह गुण हैं, वहाँ स्त्रियों ही की चलती है। मर्द कमा कर खिलाता है, क्यों रोब जमाने से भी जाए।'
पूर्णा - 'लेकिन प्रश्न तो रक्षा का है। उनकी रक्षा कौन करेगा?'
पूर्णा - 'लंपटों के मारे उनका रहना कठिन हो जाएगा।'
पूर्णा ने गंभीर भाव से कहा - 'समय आएगा, तो वह भी हो जाएगा, बहन अभी तो स्त्री की रक्षा मर्द ही करता है।'
शायद कमलाप्रसाद आए हैं। अपने द्वार पर खड़ी हो कर झाँकने लगी। सुमित्रा अपने कमरे से दबे पाँव निकल कर इधर-उधर सशंक नेत्रों से ताकती, मर्दाने कमरे की ओर चली जा रही थी। पूर्णा समझ गई, आज रमणी का मान टूट गया। बात ठीक थी। सुमित्रा ने आज पति को मना लाने का संकल्प कर लिया था। वह कमरे से निकली, आँगन को भी पार किया, दालान से भी निकल गई, पति-द्वार पर भी जा पहुँची। वहाँ वह एक क्षण तक खड़ी सोच रही थी, कैसे पुकारूँ? सहसा कमलाप्रसाद के