पूर्णा - 'ये सारी बातें तभी तक हैं, जब तक पति-देव रूठे हुए हैं। अभी आ कर गले लगा लें, तो तुम पैर चूमने लगोगी।'

इतने में कहार ने आ कर कहा - 'बहू जी, बाबू जी ने रेशमी अचकन माँगी है।'

कहार ने हाथ जोड़ कर कहा - 'सरकार, निकाल के दे दें, नाहीं हमार कुंदी होय लगी, चमड़ी उधेड़ ले हैं।'

कहार चला गया, तो पूर्णा ने कहा - 'बहन, क्यों रार बढ़ाती हो। लाओ मुझे कुंजी दे दो, मैं निकाल कर दे दूँ। उनका क्रोध जानती हो?'

कहार ने लौट कर कहा - 'सरकार कहते हैं कि अचकन लोहे वाली संदूक में धरी है।'

कहार - 'इ तो हम नहीं कहा सरकार! आप दूनों परानी छिन भर माँ एक्के होइ हैं, बीच में हमारा कुटम्मस होइ जाई।'

कहार मुँहलगा था। बोला - 'सरकार का जितना मारै का होय मार लें, मुदा बाबूजी से न पिटावें। अस घूंसा मारत हैं सरकार कि कोस-भर लै धमाका सुनात है।'


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खाँसने की आवाज सुन कर वह भागी, बेतहाशा भागी, और अपने कमरे में आ कर ही रूकी। उसका प्रेम-पीड़ित हृदय मान का खिलौना बना हुआ था। रमणी का मान अजेय है, अमर है, अनंत है।

किंतु पूर्णा अभी तक द्वार पर खड़ी थी। सुमित्रा की वियोग-व्यथा कितनी दुःसह हो रही थी, यह सोच कर उसका कोमल हृदय द्रवित हो गया। क्या इस अवसर पर उसका कुछ भी उत्तरदायित्व न था? क्या इस भाँति तटस्थ रह कर तमाशा देखना ही उसका कर्तव्य था? इस सारी मानलीला का मूल कारण तो


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