कहार - 'अरे सरकार, जो ई होत त का पूछै का रहा। मेहरिया अस गुनन की पूरी मिली है कि बात पीछू करत है, झाड़ू पहले चलावत है। जो सरकार, सुन-भर पावे कि कौनो दुसरी मेहरिया से हँसत रहा, तो खड़े लील जाए, सरकार, खड़ै लील जाए! थर-थर काँपित है, बहूजी से तौर इतना नहीं डेराइत है।'
कहार - 'जाइत है सरकार, आज भले का मुँह नहीं देखा जान परत है।'
सुमित्रा ने उसका आँचल पकड़ लिया - 'भागती कहाँ हो? जरा तमाशा देखो! क्या शेर हैं जो खा जाएँगे।'
सुमित्रा - 'कुवचन कह बैठेंगे, तो कुवचन सुनेंगे।'
सुमित्रा - हाथ क्या चला देंगे, कोई हँसी है? फिर सूरत न देखूँगी।
कमलाप्रसाद ने कमरे में कदम रखते ही कठोर स्वर में कहा - 'बैठी गप्पें लड़ा रही हो। जरा-सी अचकन माँग भेजी, तो उठते न बना। बाप से कहा होता, किसी करोड़पति सेठ के घर ब्याहते। यहाँ का हाल तो जानते थे।'
यही था, तब वह क्या शांतचित्त से दो प्रेमियों को वियोगाग्नि में जलते देख सकती थी? कदापि नहीं। इसके पहले भी कई बार उसके जी में आया था कि कमलाप्रसाद को समझा-बुझा कर शांत कर दे, लेकिन कितनी ही शंकाएँ उसका रास्ता रोक कर खड़ी हो गई थी। आज करूणा ने उन शंकाओं का शमन कर दिया। वह कमलाप्रसाद को मनाने चली। उसके मन में किसी प्रकार का संदेह न था। कमलाप्रसाद को वह शुरू से ही अपना बड़ा भाई समझती आ रही थी, भैया कह कर पुकारती भी थी। फिर उसे उनके