कमलाप्रसाद - 'तुम तो बड़ी समझदार थीं, तुम्हीं ने पता लगा लिया होता।'
कमलाप्रसाद - 'नहीं झगड़ा करना चाहता हूँ।'
कमलाप्रसाद - 'मेरी अचकन निकालती हो या नहीं?'
कमलाप्रसाद - 'मैं तो रोब से ही कहता हूँ।'
कमलाप्रसाद - 'तुम्हें निकालना पड़ेगा।'
कमलाप्रसाद - 'अनर्थ हो जाएगा सुमित्रा, अनर्थ हो जाएगा। कहे देता हूँ।'
कमलाप्रसाद - 'तुम अपने घर चली जाओ।'
कमलाप्रसाद - 'लखपती बाप का घर तो है।'
सुमित्रा ने ऐंठ कर कहा - 'बहन, मुँह देखे की सनद नहीं। काहे के यह बड़े समझदार बन गए और मैं बेसमझ हो गई? इसी मूँछ से। जो आदमी मुझ जैसी भोली-भाली स्त्री को आज तक अपनी मुट्ठी में न कर सका, वह समझदार नहीं, मूर्ख भी नहीं, बैल है। आखिर मैं क्यों इनकी धौंस सहूँ। जो दस बातें प्यार की करे, उसकी एक धौंस भी सह ली जाती। जिसकी तलवार सदा म्यान से बाहर रहती हो, उसकी कोई कहाँ तक सहे?'
कमरे में जाने की जरूरत ही क्या थी? वह कमरे के द्वार पर खड़ी हो कर उन्हें पुकारेगी, और कहेगी - भाभी को ज्वर हो आया है, आप जरा अंदर चले आइए। बस, यह खबर पाते ही कमलाप्रसाद दौड़े अंदर चले जाएँगे, इसमें उसे लेशमात्र भी संदेह नहीं था। तीन साल के वैवाहिक जीवन का अनुभव होने पर भी पुरुष-संसार से अनभिज्ञ थी। अपने मामा के छोटे-से गाँव में उसका बाल-जीवन बीता था। वहाँ सारा गाँव उसे बहन या बेटी कहता था। उस कुत्सित वासनाओं से रहित संसार में वह