सुमित्रा - 'मेरी बला रोए। हाँ, तुम रोओगे।'
सुमित्रा तिलमिला उठी। इस चोट का वह इतना ही कठोर उत्तर न दे सकती थी। वह यह कह न सकती थी कि मैं भी हजार शादियाँ कर सकती हूँ। तिरस्कार से भरे हुए स्वर में बोली - 'जो पुरुष एक को न रख सका, वह सौ को क्या रखेगा। हाँ, चकला बसाए तो दूसरी बात है।'
दो-तीन मिनट तक दोनों महिलाएँ मौन रहीं, दोनों ही अपने-अपने ढंग पर इस संग्राम की विवेचना कर रही थीं। सुमित्रा विजय गर्व से फूली हुई थी, उसकी आत्मा उसका लेशमात्र भी तिरस्कार नहीं कर रही थी। उसने वही किया, जो उसे करना चाहिए था। किंतु पूर्णा के विचार में सारा दोष सुमित्रा के ही सिर था। जरा उठ कर अचकन निकाल देती, तो इस ठायँ-ठायँ की नौबत ही क्यों आती। औरत को मर्द के मुँह लगना शोभा नहीं देता। न जाने इनके मुँह से ऐसे कठोर शब्द कैसे निकले?
स्वछंद रूप से खेत, खलिहान में विचरा करती थी। विवाह भी ऐसे पुरुष से हुआ, जो जवान हो कर भी बालक था, जो इतना लज्जाशील था कि यदि मुहल्ले की कोई स्त्री घर आ जाती, तो अंदर कदम न रखता। वह अपने कमरे से निकली और मर्दाने कमरे के द्वार पर जा कर धीरे से किवाड़ पर थपकी दी। भय तो उसे यह था कि कमलाप्रसाद की नींद मुश्किल से टूटेगी, लेकिन वहाँ नींद कहाँ? आहट पाते ही कमलाप्रसाद ने द्वार खोल दिया और पूर्णा को देखकर कौतूहल से बोला - 'क्या है पूर्णा, आओ बैठो।'