पत्थर का कलेजा है। बेचारे कमलाप्रसाद बाबू तो जैसे ठगे रह गए। ऐसी औरत की अगर मर्द बात न पूछे तो गिला कैसा?
पूर्णा - 'सुनाने में तो तुमने कोई बात उठा नहीं रखी, बहन दूसरा मर्द होता तो जाने क्या करता।'
पूर्णा - 'बहन, और दिनों की तो मैं नहीं चलाती पर आज तुम्हारी ही हठधर्मी थी।'
पूर्णा - 'मैंने तो ऐसी कोई बात नहीं कही बहन, मुझ पर नाहक बिगड़ती हो।'
पूर्णा को यह अंतिम वाक्य बाण के समान लगा। वह हक्की-बक्की हो कर सुमित्रा का मुँह ताकने लगी। यद्यपि वह सदैव सुमित्रा की ठकुरसुहाती किया करती थी, फिर भी वह यह जानती थी कि जिस दिन कमलाप्रसाद साड़ियाँ लाए थे, उसी दिन से सुमित्रा उसे संदेह की दृष्टि से देखने लगी है, किंतु उस अवसर पर पूर्णा ने कमलाप्रसाद का उपहार वापस करके अपनी समझ में संदेह को मिटा देने का सफल प्रयत्न किया था। फिर आज
कमलाप्रसाद ने विस्मित हो कर कहा - 'मनाने आई थीं, सुमित्रा? झूठी बात। मुझे कोई मनाने नहीं आया था। मनाने ही क्यों लगी। जिससे प्रेम होता है, उसे मनाया जाता है। मैं तो मर भी जाऊँ, तो किसी को रंज न हो। हाँ, माँ-बाप रो लेंगे। सुमित्रा मुझे क्यों मनाने लगी। क्या तुमसे कहती थी?'
कमलाप्रसाद ने मानो यह बात नहीं सुनी। समीप आ कर बोले - 'यहाँ कब तक खड़ी रहोगी। अंदर आओ, तुमसे कुछ कहना है।'
कमलाप्रसाद उसकी घबराहट देख कर पलंग पर जा बैठा और