सुमित्रा अकारण ही क्यों उस पर यों निर्दय प्रहार कर रही है। उसे फिर भ्रम हुआ कि कहीं सुमित्रा ने रात की बात जान तो नहीं ली। वह भीत और आहत हो कर दबी जबान से बोली - 'बहन, तुम्हारे मन में जो बात हो, वह साफ-साफ कह दो। मुझ अनाथ को जला कर क्या पाओगी? अगर मेरा यहाँ रहना तुम्हें बुरा लगता है तो मैं आज ही मुँह में कालिख लगा कर यहाँ से चली जाऊँगी। संसार में लाखों विधवाएँ पड़ी हैं, क्या सभी के रक्षक बैठे हैं? किसी भाँति उनके दिन भी कटते ही हैं। मेरे भी उसी भाँति कट जाएँगे और फिर कहीं आश्रय नहीं है तो गंगा तो कहीं नहीं गई है।'

पूर्णा ने ये बातें मानो सुनी ही नहीं। बहुएँ पति से रूठ कर प्रायः ऐसी विरागपूर्ण बातें किया ही करती हैं। यह कोई नई बात नहीं थी। वह अपने ही को सुना कर बोली - 'मैं जानती थी कि अपने झोंपड़े से पाँव बाहर निकालना मेरे लिए बुरा


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आश्वासन देता हुआ बोला - 'डरो मत पूर्णा, आराम से बैठो मैं भी आदमी हूँ, कोई काटू नहीं हूँ। आखिर मुझसे क्यों इतनी भागी-भागी फिरती हो? मुझसे दो बात करना भी तुम्हें नहीं भाता। तुमने उस दिन साड़ी लौटा दी, जानती हो मुझे कितना दुःख हुआ?'

'कमलाप्रसाद ने यह बात न सुनी। उसकी आतुर दृष्टि पूर्णा के रक्तहीन मुखमंडल पर जमी हुई थी। उसके हृदय में कामवासना की प्रचंड ज्वाला दहक उठी। उसकी सारी चेष्टा, सारी चेतनता, सारी प्रवृत्ति एक विचित्र हिंसा के भाव से आंदोलित हो उठी।


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