होगा। जान-बूझ कर मैंने अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारी। मैं कमलाप्रसाद बाबू की बातों में आ गई। इतनी जग-हँसाई और भाग में लिखी थी।'
उसने अपना वाक्य समाप्त तो कर दिया, पर मुख की चेष्टा से ज्ञात होता था कि वह और कुछ कहना चाहती है, लेकिन किसी कारणवश नहीं कह रही है।
सुमित्रा - 'तो जाती कहाँ हो, जरा बैठो तो।'
पूर्णा इधर अपने कमरे में आ कर रोने लगी। उधर सुमित्रा ने हारमोनियम पर गाना शुरू किया -
यह गाना था या पूर्णा पर विजय पाने का आह्लाद! पूर्णा को तो यह विजय-गान-सा प्रतीत हुआ। एक-एक स्वर उसके हृदय पर एक-एक शर के समान चोट कर रहा था। क्या अब इस घर में उसका निर्वाह हो सकता है? असंभव! न जाने वह कौन-सी मनहूस घड़ी थी, जब वह इस घर में आई? अपने उस झोंपड़े में रह कर सिलाई करके या चक्की पीस कर क्या वह जीवन
हिंसक पशुओं की आँखों में शिकार करते समय जो स्फूर्ति झलक उठती है, कुछ वैसी ही स्फूर्ति कमलाप्रसाद की आँखों में झलक उठी। वह पलंग से उठा और दोनों हाथ खोले हुए पूर्णा की ओर बढ़ा। अब तक पूर्णा भय से काँप रही थी। कमलाप्रसाद को अपनी ओर आते देख कर उसने गर्दन उठा कर आग्नेय नेत्रों से उसकी ओर देखा। उसकी दृष्टि में भीषण संकट तथा भय था, मानो वह कह रही थी - खबरदार। इधर एक जौ-भर भी बढ़े, तो हम दोनों में से एक का अंत हो जाएगा। इस समय पूर्णा