व्यतीत न कर सकती थी? बेचारी बिल्लो अंत तक उसे समझाती रही, पर भाग्य में तो धक्के खाने लिखे थे, उसकी बात कैसे मानती?
पूर्णा रात ही से एकांत में रात के समय कमलाप्रसाद के पास जाने पर पछता रही थी। उन भले आदमी को भी उस समय चुहल करने की सूझ गई। मगर वह साड़ी मुझ पर खूब खिल रही थी। मुझे वहाँ जाना ही न चाहिए था, पर एक बार और उनसे मिलना होगा। मैं द्वार पर खड़ी रहूँगी, मुझे कमरे में जाने की जरूरत ही क्या है? खड़े-खड़े कह दूँगी - बाबू जी, अब मुझे आप जाने दीजिए और कहीं जगह नहीं है तो बाबू अमृतराय का विधवाश्रम तो है। दस-पाँच विधवाएँ वहाँ रहती भी तो हैं। मैं भी वहीं चली जाऊँ, तो क्या हर्ज है? वह समझाएँगे तो बहुत, सुमित्रा को डाँटने पर भी तैयार हो जाएँगे, पर इस डाँट-डपट से और भी झमेला बढ़ेगा, तरह-तरह के संदेह लोगों के मन
को अपने हृदय में एक असीम शक्ति का अनुभव हो रहा था, जो सारे संसार की सेनाओं को अपने पैरों-तले कुचल सकती थी। उसकी आँखों की वह प्रदीप्त ज्वाला, उसकी वह बँधी हुई मुट्ठियाँ और तनी हुई गर्दन देख कर कमलाप्रसाद ठिठक गया, होश आ गए, एक कदम भी आगे बढ़ने की उसे हिम्मत न पड़ी। खड़े-खड़े बोला - 'यह रूप मत धारण करो, पूर्णा। मैं जानता हूँ कि प्रेम-जैसी वस्तु छल-बल से नहीं मिल सकती, न मैं इस इरादे से तुम्हारे निकट आ रहा था। मैं तो केवल तुम्हारी कृपा-दृष्टि