में पैदा होंगे। अभी कम-से-कम लोगों को मुझ पर दया आती है, फिर तो कोई बात भी न पूछेगा। विधवा को कुलटा बनते कितनी देर लगती है।

पूर्णा ने द्वार पर खड़े-खड़े कहा - 'मेरे वहाँ आने का कोई काम नहीं है। मैं केवल आपसे विदा माँगने आई हूँ। इस घर में अब मेरा निर्वाह नहीं हो सकता। आखिर मैं भी तो आदमी हूँ। कहाँ तक सबका मुँह ताकूँ और किस-किस की खुशामद करूँ?'

पूर्णा - 'मेरे अंदर आने की जरूरत नहीं। यों ही ताने मिल रहे हैं, फिर तो न जाने क्या कलंक लग जाएगा।'

पूर्णा - 'किसी ने दिया हो, आपका पूछना और मेरा कहना दोनों व्यर्थ है। तानेवाली बात होगी तो सभी ताने देंगे। आप किसी का मुँह नहीं बंद कर सकते। केले के लिए तो ठीकरा भी पैनी छुरी बन जाता है। सबसे अच्छा यही है कि मैं यहाँ से चली जाऊँ। आप लोगों ने मेरा इतने दिन पालन किया, इसके लिए मेरा एक-एक रोआँ आप लोगों का जस गाएगा।'


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का अभिलाषी हूँ। जिस दिन से तुम्हारी मधुर छवि देखी है, उसी दिन से तुम्हारी उपासना कर रहा हूँ। पाषाण प्रतिमाओं की उपासना पत्र-पुष्प से होती है, किंतु तुम्हारी उपासना मैं आँसुओं से करता हूँ। मैं झूठ नहीं कहता पूर्णा। अगर इस समय तुम्हारा संकेत पा जाऊँ, तो अपने प्राणों को भी तुम्हारे चरणों पर अर्पण कर दूँ। यही मेरी परम अभिलाषा है। मैं बहुत चाहता हूँ कि तुम्हें भूल जाऊँ, लेकिन मन किसी तरह नहीं मानता। अवश्य ही पूर्व जन्म में तुमसे मेरा कोई घनिष्ठ संबंध रहा होगा, कदाचित


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