'कहीं-न-कहीं ठिकाना लग ही जाएगा और कुछ न होगा तो गंगा जी तो हैं ही।'
पूर्णा ने तिरस्कार के भाव से देख कर कहा - 'कैसी बात मुँह से निकालते हो, बाबूजी। मेरा प्राण भी आप लोगों के काम आए तो मुझे उसको देने में आनंद मिलेगा, लेकिन बात बढ़ती जाती है और आगे चल कर न जाने और कितनी बढ़ें इसलिए मेरा यहाँ से जाना ही अच्छा है।'
पूर्णा द्वार से चिपकी हुई बोली - 'पहले द्वार खोल दो तो मैं बताऊँ। क्यों व्यर्थ मेरा जीवन नष्ट कर रहे हो।'
पूर्णा का निष्कपट हृदय इस प्रेम-दर्शन से घोर असमंजस में पड़ गया। उसका एक हाथ किवाड़ की चटखनी पर था, वह आप-ही-आप चटखनी के पास से हट गया। वह स्वयं एक कदम आगे बढ़ आई। उसकी दशा उस मनुष्य की-सी हो गई, जिसने अनजाने में किसी बालक का पैर कुचल दिया हो और जो उसे वेदना से छटपटाते देख, जल्दी से दौड़
उस जन्म में भी मेरी यह लालसा अतृप्त ही रही होगी। तुम्हारे चरणों पर गिर कर एक बार रो लेने की इच्छा से ही मैं तुम्हें लाया। बस, यह समझ लो कि मेरा जीवन तुम्हारी दया पर निर्भर है। अगर तुम्हारी आँखें मेरी तरफ से यों ही फिरी रहीं, तो देख लेना, एक दिन कमलाप्रसाद की लाश या तो इसी कमरे में तपड़ती हुई पाओगी, या गंगा-तट पर, मेरा यह निश्चय है।
कमलाप्रसाद चारपाई पर बैठता हुआ बोला - 'नहीं पूर्णा, मुझे तो इसमें लज्जा की कोई बात नहीं दीखती। अपनी इष्ट-देवी