कर उसे गोद में उठा ले। कमलाप्रसाद जिस दिन साड़ी लाए थे, उसी दिन से पूर्णा को कुछ शंका हो गई थी, पर उसने पुरूषों का विनोद समझ लिया था। अतएव इस समय यह प्रेमालाप सुन कर भयभीत हो गई। घबराई हुई आवाज से बोली - 'ऐसी बातें न करो, बाबूजी। मेरा लोक और परलोक मत बिगाड़ो। फिर मैं सचमुच मरने थोड़े ही जा रही हूँ। कहीं-न-कहीं तो रहूँगी ही। कभी-कभी आती रहूँगी। मगर इस समय मुझे जाने दो। मेरी बदनामी से क्या तुम्हें दुःख न होगा?'
यह कहते-कहते कमलाप्रसाद का गला भर आया। उसने रूमाल निकाल कर आँखें पोंछीं, मानो उनमें आँसू छलक रहे हैं।
कमलाप्रसाद ने समीप जा कर उसका हाथ पकड़ लिया और गला साफ करके बोला - 'पूर्णा, तुम जिस संकट में हो, मैं उसे जानता हूँ, लेकिन सोचो, एक जीवन का मूल्य क्या एक पूर्व-स्मृति के बराबर भी नहीं? मैं तुम्हारी
की उपासना करना क्या लज्जा की बात है? प्रेम ईश्वरीय प्रेरणा है, ईश्वरीय संदेश है। प्रेम के संसार में आदमी की बनाई सामाजिक व्यवस्थाओं का कोई मूल्य नहीं। विवाह समाज के संगठन की केवल आयोजना है। जात-पात केवल भिन्न-भिन्न काम करने वाले प्राणियों का समूह है। काल के कुचक्र ने तुम्हें एक ऐसी अवस्था में डाल दिया है, जिसमें प्रेम-सुख की कल्पना करना ही पाप समझा जाता है, लेकिन सोचो तो समाज का यह कितना बड़ा अन्याय है। क्या ईश्वर ने तुम्हें इसीलिए बनाया है कि दो-तीन साल प्रेम का