पतिभक्ति के आदर्श को समझता हूँ। अपने स्वामी से तुम्हें कितना प्रेम था, यह देख चुका हूँ। उन्हें तुमसे कितना प्रेम था, यह भी देख चुका हूँ। अक्सर पार्क में हरी-भरी घास पर लेटे हुए वह घंटों तुम्हारा कीर्तिगान किया करते थे। मैं सुन-सुन कर उनके भाग्य को सराहता था और इच्छा होती थी कि तुम्हें एक बार पा जाता तो तुम्हारे चरणों पर सिर रख कर रोता। सुमित्रा से दिन-दिन घृणा होती जाती है। यह उन्हीं का बोया हुआ बीज है, जो फूलने और फलने के लिए विकल हो रहा है।'

कमलाप्रसाद ने सिर ठोक कर कहा - 'हाय, फिर वही बात। अच्छी बात है। जाओ, एक बार भी बैठने को न कहूँगा।'

कमलाप्रसाद ने कहा - 'अब जाती क्यों नहीं हो? मैंने तुम्हें बाँध तो नहीं लिया है।'

कमलाप्रसाद ने उदासीन भाव से कहा - 'तुम्हें मेरे प्राणों की रक्षा की क्या परवाह जिस तरह तुम्हारे ऊपर मेरा कुछ जोर नहीं है,


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सुख भोगने के बाद आजीवन वैधव्य की कठोर यातना सहती रहो। कभी नहीं, ईश्वर इतना अन्यायी, इतना क्रूर नहीं हो सकता। वसंत कुमार जी मेरे परम मित्र थे। आज भी उनकी याद आती है, तो आँखों में आँसू भर जाते हैं। इस समय भी मैं उन्हें अपने सामने खड़ा रखता हूँ तुमसे उन्हें बहुत प्रेम था। तुम्हारे सिर में जरा भी पीड़ा होती थी, तो बेचारे विकल हो जाते थे। वह तुम्हें सुख में मढ़ देना चाहते थे, चाहते थे कि तुम्हें हवा का झोंका भी न लगे। उन्होंने अपना जीवन ही तुम्हारे लिए अर्पण


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