उसी तरह मेरे ऊपर भी तुम्हारा कोई जोर नहीं है। या तुम्हें भूल ही जाऊँगा, या प्राणों का अंत ही करूँगा, मगर इससे तुम्हारा क्या बनता-बिगड़ता है। जी में आए, जरा-सा शोक कर लेना, नहीं वह भी न करना। मैं तुमसे गिला करने न आऊँगा।'
कमलाप्रसाद - 'इसका यह आशय हुआ कि तुम मुझे न जीने दोगी, न मरने। तुम्हारी इच्छा है सदैव तड़पता रहूँ। यह दशा मुझसे न सही जाएगी। तुम जा कर आराम से लेटो और मेरी चिंता छोड़ दो। मगर नहीं, यह मेरी भूल है, जो मैं समझ रहा हूँ कि तुम मेरे प्राणों की चिंता से मुझसे यह वायदा करा रही हो। यह केवल भिखारी को मीठे शब्दों में जवाब देने का एक ढंग है। हाँ, वायदा करता हूँ कि अपने प्राणों की रक्षा करता रहूँगा, उसी तरह जैसे तुम मेरे प्राणों की रक्षा करती हो।'
'तो प्रिये, यह गाँठ में बाँध लो कि कमलाप्रसाद विरह-वेदना सहने के लिए जीवित नहीं रह सकता।'
कर दिया था। रोओ मत पूर्णा, तुम्हें जरा उदास देख कर उनका कलेजा फट जाता था, तुम्हें रोते देख कर उनकी आत्मा को कितना दुःख होगा, फिर यह आज कोई नई बात नहीं। इधर महीनों से तुम्हें रोने के सिवा दूसरा काम नहीं है और निर्दयी समाज चाहता है कि तुम जीवन पर्यंत यों ही रोती रहो, तुम्हारे मुख पर हास्य की एक रेखा भी न दिखाई दे, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। तुम दुष्टा हो जाओगी। उस आत्मा को तुम्हारी यह व्यर्थ की साधना देख कर कितना दुःख होता होगा, इसकी कल्पना तुम कर सकती