कमलाप्रसाद ने आवेश में आ कर कहा - 'अच्छा अब चुप रहो, पूर्णा। ऐसी बातों से मुझे मानसिक कष्ट हो रहा है। तुम समझ रही हो कि मैं अपनी नीच वासना की तृप्ति के लिए तुम्हें मायाजाल में फँसा रहा हूँ। यह तुम मेरे साथ घोर अन्याय कर रही हो। तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊँ कि यह मायाजाल नहीं, शुद्ध आत्म-समर्पण है। यदि इसका प्रमाण चाहती हो, तो यह लो...'
यदि पूर्णा एक क्षण ही धैर्य से बैठी रह सकती तो उसे अवश्य यह प्रमाण मिल जाता, पर रमणी का कातर हृदय सहम उठा। यह बात जान कर ही कमलाप्रसाद ने यह अभिनय किया था। पूर्णा ने तलवार उसके हाथ से छीन ली और बोली - 'मैं तो तुमसे कोई प्रमाण नहीं माँग रही हूँ।'
'भूल हुई, क्षमा करो।'
पूर्णा ने तलवार को म्यान में रखते हुए कहा - 'तुम इसी तलवार से मेरे जीवन का अंत कर सकते तो कितना अच्छा होता? मुझे विश्वास है कि मैं जरा भी न झिझकती, सिर झुकाए खड़ी रहती।'
हो? ईश्वर तुम्हें दुःख के इस अपार सागर में डूबने नहीं देना चाहते। वह तुम्हें उबारना चाहते हैं, तुम्हें जीवन के आनंद में मग्न कर देना चाहते हैं। यदि उनकी प्रेरणा न होती, तो मुझ जैसे दुर्बल मनुष्य के हृदय में प्रेम का उदय क्यों होता? जिसने किसी स्त्री की ओर कभी आँख उठा कर नहीं देखा, वह आज तुमसे प्रेम की भिक्षा क्यों माँगता होता? मुझे तो यह दैव की स्पष्ट प्रेरणा मालूम हो रही है।'
कमलाप्रसाद उसे फर्श पर बैठते देख कर उठा और उसका हाथ पकड़ कर कुर्सी पर बिठाने