पूर्णा ने पान के दो बीड़े बना कर कमलाप्रसाद को देने के लिए हाथ बढ़ाया। कमलाप्रसाद ने पान ले कर कहा - 'भोजन के बाद कुछ दक्षिणा मिलनी चाहिए।'
कमलाप्रसाद पान बढ़ाता हुआ बोला - 'मेरी दक्षिणा यही है कि यही बीड़े मेरे हाथ से खा लो।'
कमलाप्रसाद ने बीड़े उसके मुँह के समीप ले जा कर कहा - 'मैं अपने हाथ से खिलाऊँगा।'
'जी नहीं, गुरू जी ने मुझे यह पाठ नहीं पढ़ाया है।'
पूर्णा ने मुँह खोल दिया और कमलाप्रसाद ने उसे पान खिला दिया। पूर्णा की छाती धक-धक कर रही थी। कमलाप्रसाद कहीं कोई नटखटी न कर बैठे। मगर कमलाप्रसाद इतना बेशउर न था कि समीप आते हुए शिकार को दूर से ही चौंका देता। उसने पान खिला दिया और चारपाई पर बैठ कर बोला - 'अब यहाँ से कहीं जाने का नाम मत लेना। सारा जमाना छूट जाए, पर तुम मुझसे नहीं छूट सकती। जीवन-भर
की चेष्टा करते हुए बोला - 'नहीं-नहीं पूर्णा, यह नहीं, हो सकता। फिर मैं भी जमीन पर बैठूँगा। आखिर इस कुर्सी पर बैठने में तुम्हें क्या आपत्ति है?'
कमलाप्रसाद का चेहरा खिल उठा, बोला - 'अगर कोई कुछ कहे, तो उसकी मूर्खता है। सुमित्रा को यहाँ बैठे देख कर कोई कुछ न कहेगा, तुम्हें बैठे देख कर उसके हाथ आप ही छाती पर पहुँच जाएँगे। यह आदमी के रचे हुए स्वाँग हैं और मैं इन्हें कुछ नहीं समझता। जहाँ देखो ढकोसला, जहाँ देखो पाखंड। हमारा सारा जीवन पाखंडमय हो