के लिए यही घर तुम्हारा घर है और मैं तुम्हारा दास हूँ। जिस दिन तुमने यहाँ से जाने का नाम लिया, उसी दिन मैंने किसी तरफ का रास्ता लिया।'

कमलाप्रसाद ने दृढ़ता से कहा - 'ऐसी शंकाओं को मन में न आने दो प्रिये, आखिर विवाहिता ही क्या पुरुष को जंजीर से बाँध रखती है। वहाँ भी तो पुरुष वचन ही का पालन करता है? जो वचन का पालन नहीं करना चाहता, क्या विवाह उसे किसी तरह मजबूर कर सकता है? सुमित्रा मेरी विवाहिता हो कर ही क्या ज्यादा सुखी हो सकती है? यह तो मन मिले की बात है। जब विवाह के अवसर पर बिना जाने-बूझे कही जाने वाली बात का इतना महत्व है, तो क्या प्रेम से भरे हृदय से निकलने वाली बात का कोई महत्व ही नहीं? जरा सोचो। आदमी जीवन में सुख ही तो चाहता है या और कुछ? फिर जिस प्राणी के साथ उसका जीवन सुखमय हो रहा है, उसे वह कैसे छोड़ सकता है, उसके साथ कैसे निठुरता या कपट कर सकता है?'


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गया है। मैं इस पाखंड का अंत कर दूँगा। पूर्णा, मैं तुमसे सच कहता हूँ, मैंने आज तक किसी स्त्री की ओर आँख नहीं उठाई। मेरी निगाह में कोई जँचती ही न थी, लेकिन तुम्हें देखते ही मेरे हृदय में एक विचित्र आंदोलन होने लगा। मैं उसी वक्त, समझ गया कि यह ईश्वर की प्रेरणा है। यदि ईश्वर की इच्छा न होती तो तुम इस घर में आती ही क्यों? इस वक्त तुम्हारा यहाँ आना भी ईश्वरीय प्रेरणा है, इसमें लेशमात्र भी संदेह न समझना। एक-से-एक सुंदरियाँ मैंने देखीं, मगर इस चंद्र में हृदय को खींचने वाली जो शक्ति है, वह किसी में नहीं पाई।'


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