कमलाप्रसाद ने मुस्करा कर कहा - 'नहीं, तुम भला नादान हो सकती हो, राम-राम! तुम वेद-शास्त्र सभी घोटे बैठी हो। अच्छा बताओ, विवाह कै प्रकार के होते हैं?'
'बड़ी बुद्धिमती हो, तो इसका मतलब समझो?'
कमलाप्रसाद ने विवाह के सात भेद बताए। किस समय में कौन प्रथा प्रचलित थी, उसके बाद कौन-सी प्रथा चली, और वर्तमान समय में किन-किन प्रथाओं का रिवाज है, यह सारी कथा बहुत ही बेसिर-पैर की बातों के साथ कौतूहलमग्न पूर्णा से कह सुनाई। स्मृतियों का धुरंधर ज्ञाता भी इतने संदेह-रहित भाव से इस विषय की चर्चा न कर सकता।
'हाँ, यूरोप में इसका बहुत रिवाज है। मुसलमानों में भी है। इस देश में भी पहले था, पर अब एक कानून के अनुसार फिर इसका रिवाज हो रहा है।'
'कुछ नहीं, स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को वचन देते हैं, बस विवाह हो जाता है। माता-पिता, भाई-बंधु,
कमलाप्रसाद को सहसा साड़ियों की याद आ गई। दोनों साड़ियाँ अभी तक उसने संदूक में रख छोड़ी थीं। उसने एक साड़ी निकाल कर पूर्णा के सामने रख दी और कहा - 'देखो, यह वही साड़ी है पूर्णा, उस दिन तुमने इसे अस्वीकार कर दिया था, आज इसे मेरी खातिर से स्वीकार कर लो। एक क्षण के लिए इसे पहन लो। तुम्हारी यह सफेद साड़ी देख कर मेरे हृदय में चोट-सी लगती है। मैं ईमान से कहता हूँ, यह तुम्हारे वास्ते लाया था। सुमित्रा के मन में कोई संदेह न हो, इसलिए एक और