पंडित-पुरोहित किसी का काम नहीं। हाँ, वर और कन्या दोनों ही का बालिग हो जाना जरूरी है।'

कमलाप्रसाद ने प्रतिवाद किया - 'मेरी समझ में तो जिसे तुम विवाह समझ रही हो, वही लड़कों का खेल है। ढोल-मजीरा बजा, आतिशबाजियाँ छूटीं और दो अबोध बालक, जो विवाह का मर्म तक नहीं समझते, एक-दूसरे के गले जीवन-पर्यंत के लिए मढ़ दिए गए। सच पूछो तो यही लड़कों का खेल है।'

कमलाप्रसाद ने उत्तेजित हो कर कहा - 'दुनिया अंधी है, उसके सारे व्यापार उल्टे हैं। मैं ऐसी दुनिया की परवाह नहीं करता। मनुष्य को ईश्वर ने इसलिए बनाया है कि वह रो-रो कर जिंदगी के दिन काटे, केवल इसलिए कि दुनिया ऐसा चाहती है? साधारण कामों में जब हमसे कोई भूल हो जाती है, तो हम उसे तुरंत सुधारते हैं। तब जीवन को हम क्यों एक भूल के पीछे नष्ट कर दें। अगर आज किसी दैवी बाधा से यह मकान


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लानी पड़ी। नहीं, उठा कर रखो मत। केवल एक ही क्षण के लिए पहन लो। जरा मैं देखना चाहता हूँ कि इस रंग की साड़ी तुम्हें कितनी खिलती है। न मानोगी तो जर्बदस्ती पहना दूँगा।'

कमलाप्रसाद - 'मैं हट जाता हूँ।'

कमलाप्रसाद ने परदे की आड़ से कहा - 'पहन चुकीं? अब बाहर निकलूँ?'

कमलाप्रसाद ने परदा उठा कर झाँका। पूर्णा हँस पड़ी। कमलाप्रसाद ने फिर परदा खींच लिया और उसकी आड़ से बोला - 'अबकी अगर तुमने न पहना पूर्णा, तो मैं आ कर जर्बदस्ती पहना दूँगा।'


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