गिर पड़े तो हम कल ही इसे बनाना शुरू कर देंगे, मगर जब किसी अबला के जीवन पर दैवी आघात हो जाता है, तो उससे आशा की जाती है कि वह सदैव उसके नाम को रोती रहे। यह कितना बड़ा अन्याय है। पुरूषों ने यह विधान, केवल अपनी काम-वासना को तृप्त करने के लिए किया है। बस, इसका और कोई अर्थ नहीं। जिसने यह व्यवस्था की, वह चाहे देवता हो या ऋर्षि अथवा महात्मा, मैं उसे मानव समाज का सबसे बड़ा शत्रु समझता हूँ। स्त्रियों के लिए पतिव्रत-धर्म की पख लगा दी। पुनः संस्कार होता, तो इतनी अनाथ स्त्रियाँ उसके पंजे में कैसे फँसतीं। बस, यही सारा रहस्य है। न्याय तो हम तब समझते, जब पुरूषों को भी यही निषेध होता।'
'और क्या? धूर्तों का पाखंड है।'
'केवल इसलिए कि उनका चरित्र अच्छा नहीं। वह विवाह-बंधन में न पड़ कर छूटे साँड़ बने रहना चाहते हैं। उनका विधवाश्रम केवल
पूर्णा - 'पहने हुए तो हूँ। अब कैसे पहनूँ। कौन अच्छी लगती है। मेरी देह पर आ कर साड़ी की मिट्टी भी खराब हो गई।'
कमलाप्रसाद - 'दीपक की ज्योति मात हो गई। वाह रे ईश्वर! तुम ऐसी आलोकमय छवि की रचना कर सकते हो। तुम्हें धन्य है।'
कमलाप्रसाद - 'ईश्वर अब मेरा बेड़ा कैसे पार लगेगा।'
कमलाप्रसाद ने पूछा - 'यहाँ क्यों रखती हो?'
कमलाप्रसाद - 'ईश्वर दंड नहीं देंगे, पूर्णा, यह उन्हीं की आज्ञा है। तुम उनकी चिंता न करो। खड़ी क्यों हो। अभी तो बहुत रात है, क्या अभी से भाग जाने का इरादा है।'