अध्याय 12

पूर्णा कितना ही चाहती थी कि कमलाप्रसाद की ओर से अपना मन हटा ले, पर यह शंका उसके हृदय में समा गई थी कि कहीं इन्होंने सचमुच आत्म-हत्या कर ली तो क्या होगा? रात को वह कमलाप्रसाद की उपेक्षा करके चली तो आई थी, पर शेष रात उसने चिंता में काटी। उसका विचलित हृदय पति-भक्ति, संयम और व्रत के विरुद्ध भाँति-भाँति की तर्कनाएँ करने लगा। क्या वह मर जाती, तो उसके पति पुनर्विवाह न करते? अभी उनकी अवस्था ही क्या थी? पच्चीस वर्ष की अवस्था में क्या विधुर जीवन का पालन करते? कदापि नहीं। अब उसे याद ही न आता था कि पंडित वसंत कुमार ने उसके साथ कभी इतना अनुरक्त प्रेम किया था। उन्हें इतना अवकाश ही कहाँ था। सारे दिन तो दफ्तर में बैठे रहते थे, फिर उन्होंने उसे सुख ही क्या पहुँचाया? एक-एक पैसे की तंगी रहती थी, सुख क्या पहुँचाते। उनके साथ भी रो-रो


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एक बार दाने पर आ कर फिर न जाने क्या आहट पा कर उड़ गई थी। इतनी ही देर में पूर्णा के मनोभावों में कितने रूपांतर हुए, वह खड़ा यही सोचता रहा। वह रोष, फिर वह हास-विलास, और अंत में यह विराग! यह रहस्य उसकी समझ में न आता था। क्या वह चिड़िया फिर दाने पर गिरेगी? यही प्रश्न कमलाप्रसाद के मस्तिष्क में बार-बार उठने लगा।


अध्याय 10

आदर्श हिंदू-बालिका की भाँति प्रेमा पति के घर आ कर पति की हो गई थी। अब अमृतराय उसके लिए केवल एक स्वप्न


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