कर ही जिंदगी कटती थी। क्या रो-रो कर प्राण देने के लिए उसका जन्म हुआ है? स्वर्ग और नरक सब ढकोसला है। अब इससे दुःखदाई नरक क्या होगा? जब नरक ही में रहना है, तो नरक ही सही। कम-से-कम जीवन के कुछ दिन आनंद से कटेंगे; जीवन का कुछ सुख तो मिलेगा। जिससे प्रेम हो, वही अपना सब कुछ। विवाह और संस्कार सब दिखावा है? चार अक्षर संस्कृत पढ़ लेने से क्या होता है? मतलब तो यही है न किसी प्रकार स्त्री का पालन-पोषण हो। उँह, इस चिंता में क्यों कोई मरे? विवाह क्या स्त्री को पुरुष से बाँध देता है? वह भी मन मिले ही का सौदा है। स्त्री और पुरुष का मन न मिला तो विवाह क्या मिला देगा? बिना विवाह हुए स्त्री-पुरुष आजीवन प्रेम से रहते हैं। कुत्सित भावनाओं में पूर्णा ने भोर कर दिया।
सुमित्रा ने तीव्र स्वर में कहा - 'नींद आई ही किसे थी?'
सुमित्रा - 'क्या तुमने अभी तक उनकी चाह नहीं पाई? तुम तो इन बातों में चतुर हो।'
की भाँति थे, जो उसने कभी देखा था। वह गृह-कार्य में बड़ी कुशल थी। सारा दिन घर का कोई-न-कोई काम करती रहती। दाननाथ को सजावट का सामान खरीदने का शौक था, वह अपने घर को साफ-सुथरा सजा हुआ देखना भी चाहते थे। लेकिन इसके लिए जिस संयम और श्रम की जरूरत है, वह उनमें न था। कोई चीज ठिकाने से रखना उन्हें आता ही न था। ऐनक स्नान के कमरे के ताक पर रख दिया, तो उसकी याद उस वक्त आती जब कॉलेज में उसकी जरूरत पड़ती। खाने-पीने, सोने-जागने