सुमित्रा - 'पहले मैं भी ऐसा ही समझती थी पर अब मालूम हुआ कि मुझे धोखा हुआ था।'
सुमित्रा - 'हाँ, आज लड़ने ही आई हूँ। हम दोनों अब इस घर में नहीं रह सकतीं।'
सुमित्रा ने फिर कहा - 'तुमने जब पहले-पहल इस घर में कदम रखे थे, तभी मैं खटकी थी। मुझे उसी वक्त यह संशय हुआ था कि तुम्हारा यौवन और उस पर सरस स्वभाव मेरे लिए घातक होगा, इसीलिए मैंने तुम्हें अपने साथ रखना शुरू किया था। लेकिन होनहार को कौन टाल सकता था? मैं जानती हूँ, तुम्हारा हृदय निष्कपट है। अगर तुम्हें कोई न छेड़ता तो तुम जीवन-पर्यंत अपने व्रत पर स्थिर रहतीं। लेकिन पानी में रह कर हलकोरों से बचे रहना तुम्हारी शक्ति के बाहर था। बे-लंगर की नाव लहरों में स्थिर नहीं रह सकती। पड़े हुए धन को उठा लेने में किसे संकोच होता है? मैंने अपनी आँखों सब कुछ देख लिया है पूर्णा।
का कोई नियम न था। कभी कोई अच्छी पुस्तक मिल गई, तो सारी रात जागते रहे। कभी सरेशाम से सो रहे, तो खाने-पीने की सुध न रही। आय-व्यय की व्यवस्था न थी। जब तक हाथ में रुपए रहते, बेदरेग खर्च किए जाते, बिना जरूरत की चीजें आया करतीं। रुपए खर्च हो जाने पर, लकड़ी और तेल में किफायत करनी पड़ती थी। तब वह अपनी वृद्ध माता पर झुँझलाते, पर माता का कोई दोष न था। उनका बस चलता तो अब तक दाननाथ चार पैसे के आदमी हो गए होते। वह पैसे का काम