तुम दुलक नहीं सकती। मैं जो कुछ कह रही हूँ तुम्हारे ही भले के लिए कह रही हूँ। अब भी अगर बच सकती हो तो उस कुकर्मी का साया भी अपने ऊपर न पड़ने दो। यह न समझो कि मैं अपने लिए, अपने पहलू का काँटा निकालने के लिए तुमसे ये बातें कर रही हूँ मैं जैसी तब थी वैसी ही अब हूँ। मेरे लिए 'जैसे कांता घर रहे वैसे रहे विदेश।' मुझे तुम्हारी चिंता है। यह पिशाच तुम्हें कहीं का न रखेगा। मैं तुम्हें एक सलाह देती हूँ। कहो कहूँ, कहो न कहूँ?'

सुमित्रा बोली - 'उससे तुम साफ-साफ कह दो कि वह तुमसे विवाह कर ले।'

सुमित्रा - 'विवाह में केवल एक बार की जग-हँसाई है फिर कोई कुछ न कह सकेगा। इस भाँति लुक-छिप कर मिलना तो आत्मा और परलोक दोनों ही का सर्वनाश कर देगा। उसके प्रेम की परीक्षा भी हो जाएगी। अगर वह विवाह करने पर राजी हो जाए तो समझ लेना


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धेले में निकलना चाहती थी। कोई महरी, कोई कहार, उनके यहाँ टिकने न पाता था। उन्हें अपने हाथों काम करने में शायद आनंद आता था। वह गरीब माता-पिता की बेटी थी, दाननाथ के पिता भी मामूली आदमी थे और फिर जिए भी बहुत कम। माता ने अगर इतनी किफायत से काम न लिया होता तो दाननाथ किसी दफ्तर के चपरासी होते। ऐसी महिला के लिए कृपणता स्वाभाविक ही थी। वह दाननाथ को अब भी वही बालक समझती थीं जो कभी उनकी गोद में खेला करता था। उनके जीवन का वह सबसे


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