सुमित्रा ने हँस कर कहा - 'तो क्या तुम समझती हो, यह धमकी सुन कर मैं भी उसके सामने सिर झुका देती? हजार बार नहीं! मैं साफ कहती, जरूर प्राण दे दो। कल देते हो तो आज ही दे दो। तुमसे न बने तो लाओ मैं मौत के घाट उतार दूँ। इन धूर्त लंपटों का यह भी एक लटका है। इसी तरह प्रेम जता कर ये रमणियों पर अपना रंग जमाते हैं। ऐसे बेहया मरा नहीं करते। मरते हैं वे, जिनमें सत्य का बल होता है। ऐसे विषय-वासना के पुतले मर जाएँ, तो संसार स्वर्ग हो जाए। ये दुष्ट वेश्याओं के पास नहीं जाते। वहाँ जाते इनकी नानी मरती है। पहले तो वेश्या देवी भरपूर पूजा लिए सीधे मुँह बात नहीं करती, दूसरे वहाँ शहर के गुंडों का जमघट रहता है, कहीं किसी से मुठभेड़ हो जाए, तो लाला की हड्डी-पसली चूर कर दें। ये ऐसे ही शिकार की टोह में रहते हैं, जहाँ न पैसे का खर्च है, न
काम का समय और नियम था, हरेक चीज का विशेष स्थान था, आमदनी और खर्च का हिसाब था। दाननाथ को अब दस बजे सोना और पाँच बजे उठना पड़ता था, नौकर-चाकर खुश थे और सबसे ज्यादा खुश थी प्रेमा की सास। दाननाथ को जेब खर्च के लिए पच्चीस रुपए दे कर प्रेमा बाकी रुपए सास के हाथ में रख देती थी और जिस चीज की जरूरत होती, उन्हीं से कहती। इस भाँति वृद्धा को गृह-स्वामिनी का अनुभव होता था। यद्यपि शुरू महीने से वह कहने लगती थीं अब रुपए नहीं रहे, खर्च हो गए,