कहते हुए दाननाथ बाहर निकल आए और अमृतराय द्वार पर खड़े, उन्हें रोकने की इच्छा होने पर भी बुला न सके।
अध्याय 3
होली का दिन आया। पंडित वसंत कुमार के लिए यह भंग पीने का दिन था। महीनों पहले से भंग मँगवा रखी थी। अपने मित्रों को भंग पीने का नेवता दे चुके थे। सवेरे उठते ही पहला काम जो उन्होंने किया, वह भंग धोना था।
सहसा बाबू कमलाप्रसाद आ पहुँचे। यह जमघट देख कर बोले - 'क्या हो रहा है? भई, हमारा हिस्सा भी है न?'
कमलाप्रसाद - 'अजी मीठी पिलाओ, नमकीन क्या? मगर यार, केसर और केवड़ा जरूर हो, किसी को भेजिए मेरे यहाँ से ले आए। किसी लौंडे को भेजिए जो मेरे घर जा कर प्रेमा से माँग लाए। कहीं धर्मपत्नी जी के पास न चला जाए, नहीं तो मुफ्त गालियाँ मिलें। त्योहार के दिन उनका मिजाज गरम हो जाया करता है। यार वसंत कुमार, धर्मपत्नियों को प्रसन्न रखने का कोई आसान नुस्खा बताओ। मैं तो तंग आ गया।'
बड़ा आनंद आया। बोलने का मर्ज था। ऐसा मनोरंजक दृश्य देख कर वह चुप कैसे रहते? अमृतराय का हाथ दबा कर कहा - 'आपकी दाढ़ी कितनी सफाई से हिल रही है, जी चाहता है, नोच कर रख लूँ।'
अमरनाथ जी ने कहा - 'मैं आपके सामने व्याख्यान देने नहीं आया हूँ।'
अमरनाथ - 'बातें बहुत हो चुकीं, अब काम करने का समय है।'
अमरनाथ - 'आप लोगों में जिन महाशयों को पत्नी-वियोग हो चुका है, वह कृपया हाथ उठाएँ।'
अमरनाथ - 'आप लोगों में कितने महाशय