चीजें भेज देता हूँ। मगर जब तक मैं न आऊँ, आप न बनवाइएगा। यहाँ इस फन के उस्ताद हैं। मौरूसी बात है। दादा तोले भर का नाश्ता करते हैं। उम्र में कभी एक दिन का भी नागा नहीं किया। मगर क्या मजाल कि नशा हो जाए।'
पूर्णा ने उबटन एक प्याली में उठाते हुए कहा -' यह देखो, मैं तो पहले ही से बैठी हुई हूँ।'
पूर्णा - 'पहले जरा यहाँ आ कर बैठ जाव, उबटन तो मल दूँ, फिर नहाने जाना।'
पूर्णा - 'वाह, उबटन क्यों न मलवाओगे? आज की तो यह रीति है, आके बैठ जाव।'
पूर्णा ने लपक कर उनका हाथ पकड़ लिया और उबटन भरा हाथ उनकी देह में पोत दिया। तब बोली -'सीधे से कहती थी, तो नहीं मानते थे अब तो बैठोगे।'
पूर्णा - 'अब गंगा जी कहाँ जाओगे। यहीं नहा लेना।।'
पूर्णा - 'अच्छा, तो जल्दी लौट आना, यह नहीं कि इधर-उधर तैरने लगो। नहाते वक्त तुम बहुत दूर तैर जाया करते हो।'
अमरनाथ भी विदा हुए। केवल एक मनुष्य अभी तक सिर झुकाए सभा-भवन में बैठा हुआ था। यह बाबू अमृतराय थे।
अमृतराय ने चौंक कर कहा - 'हाँ-हाँ, चलो।'
दाननाथ के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। बोले - 'आज तुम्हें यह क्या सूझी।'
दाननाथ - 'प्रेमा सुनेगी तो क्या कहेगी?'
दाननाथ - 'अजी जाओ भी, बातें बनाते हो। उसे तुमसे कितना प्रेम है, तुम खूब जानते हो। यद्यपि अभी विवाह नहीं हुआ, लेकिन सारा शहर जानता है कि वह तुम्हारी मँगेतर है। सोचो, उसे तुम