मगर वहाँ जा कर देखा तो फूल इतनी ही दूर और आगे थे। अब कुछ थकान मालूम होने लगी थी, किंतु बीच में कोई रेत ऐसा न था कि जिस पर बैठ कर दम लेते। आगे बढ़ते ही गए। कभी हाथों से जोर मारते, कभी पैरों से जोर लगाते फूलों तक पहुँचे। पर, उस वक्त तक सारे अंग शिथिल हो गए थे। यहाँ तक कि फूलों को लेने के लिए जब हाथ लपकाना चाहा, तो हाथ न उठ सका। आखिर उनको दाँतों में दबाया और लौटे। मगर, जब वहाँ से उन्होंने किनारे की तरफ देखा तो ऐसा मालूम हुआ, मानो एक हजार कोस की मंजिल है। शरीर बिल्कुल अशक्त हो गया था और जल-प्रवाह भी प्रतिकूल था। उनकी हिम्मत छूट गई। हाथ-पाँव ढीले पड़ गए। आस-पास कोई नाव या डोंगी न थी और न किनारे तक आवाज ही पहुँच सकती थी। समझ गए, यहीं जल-समाधि होगी। एक क्षण के लिए पूर्णा की याद आई। हाय, वह
कितनी बार प्रेम-पत्र लिख चुके हो। तीन साल से वह तुम्हारे नाम पर बैठी हुई है। भले आदमी, ऐसा रत्न तुम्हें संसार में और कहाँ मिलेगा? अगर तुमने उससे विवाह न किया तो तुम्हारा जीवन नष्ट हो जाएगा। तुम कर्तव्य के नाम पर जो चाहे करो पर उसे अपने हृदय से नहीं निकाल सकते।'
दाननाथ ने अमरनाथ का नाम आते ही नाक सिकोड़ कर कहा - 'क्या कहना है, वाह! रट कर एक व्याख्यान दे दिया और तुम लट्टू हो गए। वह बेचारे समाज की क्या खाक व्यवस्था करेंगे? यह अच्छा सिद्धांत है कि जिसकी पहली स्त्री मर गई हो, वह विधवा से विवाह करे!'