के पास हल्के दामों के दो-चार गहनों के सिवा और क्या था। षोडसी के दिन उसने वे सब गहने ला कर लाला जी के सामने रख दिए, और सजल नेत्रों से बोली - 'मैं अब इन्हें रख कर क्या करूँगी।'
बदरीप्रसाद ने करुण-कोमल स्वर में कहा - 'मैं इन्हें ले कर क्या करूँगा, बेटी? तुम यह न समझो कि मैं धर्म या पुण्य समझ कर यह काम कर रहा हूँ। यह मेरा कर्तव्य है। इन गहनों को अपने पास रखो। कौन जाने किस वक्त इनकी जरूरत पड़े। जब तक मैं जीता हूँ, तुम्हें अपनी बेटी समझता रहूँगा। तुम्हें कोई तकलीफ न होगी।'
षोडसी बड़ी धूम से हुई। कई सौ ब्राह्मणों ने भोजन किया। दान-दक्षिणा में भी कोई कमी न की गई।
रात के बारह बज गए थे। लाला बदरीप्रसाद ब्राह्मणों को भोजन करा के लेटे, तो देखा - प्रेमा उनके कमरे में खड़ी है। बोले - 'यहाँ क्यों खड़ी हो, बेटी - रात बहुत हो गई, जा कर सो रहो।'
दाननाथ - 'और प्रेमा?'
दाननाथ ने तिरस्कार-भाव से कहा - 'क्या बातें करते हो। तुम समझते हो, प्रेमा कोई बाजार का सौदा है, जी चाहा लिया, जी चाहा न लिया। प्रेम एक बीज है, जो एक बार जम कर फिर बड़ी मुश्किल से उखड़ता है। कभी-कभी तो जल, प्रकाश और वायु बिना ही जीवन पर्यंत जीवित रहता है। प्रेमा केवल तुम्हारी मँगेतर नहीं है, वह तुम्हारी प्रेमिका भी है। यह सूचना उसे मिलेगी तो उसका हृदय भग्न हो जाएगा। कह नहीं सकता, उसकी क्या दशा हो जाए। तुम उस पर घोर अन्याय कर रहे हो।'