प्रेमा - 'आपने अभी कुछ भोजन नहीं किया है न?'
बदरीप्रसाद - 'अब इतनी रात गए मैं भोजन न करूँगा। थक भी बहुत गया हूँ। लेटते ही लेटते सो जाऊँगा।'
यह कह कर बदरीप्रसाद चारपाई पर बैठ गए और एक क्षण के बाद बोले - 'क्यों बेटी, पूर्णा के मैके कोई नहीं है? मैंने उससे नहीं पूछा कि शायद उसे कुछ दुःख हो।'
प्रेमा - 'मैके में कौन है। माँ-बाप पहले ही मर चुके थे, मामा ने विवाह कर दिया। मगर जब से विवाह हुआ, कभी झाँका तक नहीं। ससुराल में भी सगा कोई नहीं है। पंडित जी के दम से नाता था।'
बदरीप्रसाद ने बिछावन की चादर बराबर करते हुए कहा - 'मैं सोच रहा हूँ, पूर्णा को अपने ही घर में रखूँ तो क्या हरज है? अकेली औरत कैसे रहेगी।'
प्रेमा - 'होगा तो बहुत अच्छा, पर अम्माँ जी मानें तब तो?'
बदरीप्रसाद - 'मानेगी क्यों नहीं, पूर्णा तो इनकार न करेगी?'
बोले - 'अगर वह उतनी ही सहृदय है, जितना मैं समझता हूँ, तो मेरी प्रतिज्ञा पर उसे दुःख न होना चाहिए। मुझे विश्वास है कि उसे सुन कर हर्ष होगा, कम-से-कम मुझे ऐसी ही आशा है।'
अमृतराय का मकान आ गया। टमटम रूक गया। अमृतराय उतर कर अपने कमरे की तरफ चले। दाननाथ जरा देर तक इंतजार में खड़े रहे कि यह मुझे बुलावें तो जाऊँ, पर जब अमृतराय ने उनकी तरफ फिर कर भी न देखा, तो उन्हें भय हुआ, मेरी बातों से कदाचित इन्हें दुःख हुआ है। कमरे के द्वार पर जा कर बोले - 'क्यों भाई, मुझसे नाराज हो गए क्या?'