प्रेमा - 'पूछूँगी। मैं समझती हूँ उन्हें इनकार न होगा।'
बदरीप्रसाद - 'अच्छा मान लो, वह अपने ही घर में रहे तो उसका खर्च बीस रुपए में चल जाएगा न?'
प्रेमा ने आर्द्र नेत्रों से पिता की ओर देख कर कहा - 'बड़े मजे से। पंडित जी पचास रुपए ही तो पाते थे।'
बदरीप्रसाद ने चिंतित भाव से कहा - 'मेरे लिए बीस, पच्चीस, साठ सब बराबर हैं, लेकिन मुझे अपनी जिंदगी ही की तो नहीं सोचनी है। अगर आज मैं न रहूँ, तो कमलाप्रसाद कौड़ी फोड़ कर न देगा, इसलिए कोई स्थायी बंदोबस्त कर जाना चाहता हूँ। अभी हाथ में रुपए नहीं हैं, नहीं तो कल ही चार हजार रुपए उनके नाम किसी अच्छे बैंक में रख देता। सूद से उसकी परवरिश होती रहती। यह शर्त कर देता कि मूल में से कुछ न दिया जाए।'
सहसा कमलाप्रसाद आँखें मलते हुए आ कर खड़े हो गए और बोले - 'अभी आप सोए नहीं? गरमी लगती हो, तो पंखा ला कर रख दूँ। रात तो ज्यादा हो गई।'
दाननाथ ने स्नेह से अमृतराय का हाथ पकड़ लिया और बोले - 'फिर सोच लो, ऐसा न हो पीछे पछताना पड़े।'
यह संकेत किसकी ओर था, दाननाथ से छिपा न रह सका। जब अमृतराय की पहली स्त्री जीवित थी, उसी समय दाननाथ से प्रेमा के विवाह की बातचीत हुई थी। जब प्रेमा की बहन का देहांत हो गया तो उसके पिता लाला बदरीप्रसाद ने दाननाथ की ओर से मुँह फेर लिया । दाननाथ विद्या, धन और प्रतिष्ठा किसी बात में भी अमृतराय की बराबरी न कर सकते थे। सबसे बड़ी बात यह