बदरीप्रसाद - 'नहीं गरमी नहीं है। प्रेमा से कुछ बातें करने लगा था। तुमसे भी कुछ सलाह लेना चाहता था, तो तुम आप ही आ गए। मैं यह सोच रहा हूँ कि पूर्णा यहीं आ कर रहे तो क्या हरज है?'

कमलाप्रसाद ने आँखें फाड़ कर कहा - 'यहाँ! अम्माँ जी कभी न राजी होंगी।'

बदरीप्रसाद - 'अम्माँ जी की बात छोड़ो, तुम्हें तो कोई आपत्ति नहीं है? मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ।'

कमलाप्रसाद ने दृढ़ता से कहा - 'मैं तो कभी इसकी सलाह न दूँगा। दुनिया में सभी तरह के आदमी हैं, न जाने क्या समझें। दूर तक सोचिए।'

बदरीप्रसाद - 'उसके पालन-पोषण का तो कुछ प्रबंध करना ही होगा।'

कमलाप्रसाद - 'हम क्या कर सकते हैं?'

बदरीप्रसाद - 'तो और कौन करेगा?'

कमलाप्रसाद - 'शहर में हमीं तो नहीं रहते। और भी बहुत से धनी लोग हैं। अपनी हैसियत के मुताबिक हम भी कुछ सहायता कर देंगे।'


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थी कि प्रेमा भी अमृतराय ही की ओर झुकी हुई मालूम होती थी। दाननाथ इतने निराश हुए कि आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय कर लिया। दोनों मित्रों में किसी प्रकार का द्वेष-भाव न आया। दाननाथ यों देखने में तो नित्य प्रसन्नचित्त रहते थे, लेकिन वास्तव में वह संसार से विरक्त से हो गए थे। उनका जीवन ही आनंद-विहीन हो गया था। अमृतराय को अपने प्रिय मित्र की आंतरिक व्यथा देख-देख कर दुःख होता था। वह अपने चित्त को इस परीक्षा के लिए महीनों से तैयार कर रहे थे। किंतु प्रेमा-जैसी


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