बदरीप्रसाद ने कटाक्ष-भाव से कहा - 'तो चंदा खोल दिया जाए, क्यों? अच्छी बात है, जाओ घूम-घूम कर चंदा जमा करो।'

कमलाप्रसाद - 'मैं क्यों चंदा जमा करने लगा।'

बदरीप्रसाद - 'तब कौन करेगा?'

कमलाप्रसाद इसका कुछ जवाब न दे सके। कुछ देर के बाद बोले - 'आखिर आपने क्या निश्चय किया है?'

बदरीप्रसाद - 'मैं क्या निश्चय करूँगा? मेरे निश्चय का अब मूल्य ही क्या? निश्चय तो वही है, जो तुम करो। मेरा क्या ठिकाना? आज मैं कुछ कर जाऊँ, कल मेरी आँख बंद होते ही तुम उलट-पुलट दो, व्यर्थ में बदनामी हो।'

कमलाप्रसाद ने बहुत दुःखित हो कर कहा - 'आप मुझे इतना नीच समझते हैं। यह मुझे न मालूम था।'

बदरीप्रसाद बेटे को बहुत प्यार करते थे, यह देख कर कि मेरी बात से उसे चोट लगी है, तुरंत बात बनाई - 'नहीं-नहीं मैं तुम्हें नीच नहीं समझता। बहुत


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अनुपम सुंदरी का त्याग करना आसान न था। ऐसी दशा में अमृतराय की ये बातें सुन कर दाननाथ का हृदय आशा से पुलकित हो उठा। जिस आशा को उन्होंने हृदय को चीर कर निकाल डाला था, जिसकी इस जीवन में वह कल्पना भी न कर सकते थे, जिसकी अंतिम ज्योति बहुत दिन हुए शांत हो चुकी थी, वही आशा आज उनके मर्मस्थल को चंचल करने लगी। इसके साथ ही अमृतराय के देवोपम त्याग ने उन्हें वशीभूत कर लिया। वह गदगद कंठ से बोले - 'क्या इसीलिए तुमने आज प्रतिज्ञा कर डाली? अगर


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