बहनों की तरह रही हैं, मुझसे इस ढंग की बात अब न करते बनेगी। मैं तो रोने लगूँगी।'
बदरीप्रसाद - 'तो मैं ही सब ठीक कर लूँगा। हाँ, कल शाम मुझे अवकाश न मिलेगा, तब तक तुम्हारी अम्माँ जी से भी बातें होंगी। शायद वह उसके यहाँ रहने पर राजी हो जाएँ।'
कमलाप्रसाद गृह-प्रबंध में अपने को लासानी समझते थे। यों तो बुद्धि विकास में वह अपने को अफलातूं से रत्ती-भर भी कम न समझते थे। पर गृह-प्रबंध में उनकी सिद्धि सर्वमान्य थी। सिनेमा रोज देखते थे, पर क्या मजाल थी कि जेब से एक पैसा भी खर्च करें। मैनेजर से दोस्ती कर रखी थी, उल्टे उसके यहाँ कभी-कभी दावत खा आते थे। पैसे का काम धेले में निकालते थे और बड़ी सुंदरता से कभी-कभी लाला बदरीप्रसाद से इस विषय में उनकी ठन भी जाया करती थी। बूढ़े लाला जी बेटे की इस कुत्सित मनोवृत्ति पर कभी-कभी खरी-खरी कह डालते
लौंडे को भेजिए जो मेरे घर जा कर प्रेमा से माँग लाए। कहीं धर्मपत्नी जी के पास न चला जाए, नहीं तो मुफ्त गालियाँ मिलें। त्योहार के दिन उनका मिजाज गरम हो जाया करता है। यार वसंत कुमार, धर्मपत्नियों को प्रसन्न रखने का कोई आसान नुस्खा बताओ। मैं तो तंग आ गया।'
कमलाप्रसाद - 'तो यार, तुम बड़े भाग्यवान हो। क्या पूर्णा तुमसे कभी नहीं रूठती?'
कमलाप्रसाद - 'कभी किसी चीज के लिए हठ नहीं करती?'
कमलाप्रसाद - 'तो यार, तुम बड़े भाग्यवान हो। यहाँ तो उम्र कैद