थे। कमलाप्रसाद समझ गए कि लाला जी इस वक्त कोई आपत्ति न सुनेंगे, बल्कि आपत्ति से उल्टा असर होने की संभावना थी। इसलिए उन्होंने कूटनीति से काम लेने का निश्चय किया। प्रातःकाल पूर्णा के द्वार पर जा कर आवाज दी। पूर्णा पहले तो उनसे परदा करती थी, पर अब बहुरिया बन कर बैठने से कैसे काम चल सकता था। उन्हें अंदर बुला लिया। बरामदे में चारपाई पड़ी हुई थी। कमलाप्रसाद बाबू उस पर जा बैठे। एक क्षण में पूर्णा आ कर उनके सामने खड़ी हो गई। पूर्णा का माथा घूँघट से ढका हुआ था, पर दोनों सजल आँखें कृतज्ञता और विनय से भरी हुई भूमि की ओर ताक रही थीं। कमलाप्रसाद उसे देख कर अवाक-सा रह गया। वह इस इरादे से आया था कि इसे किसी भाँति यहाँ से टाल दूँ। मैके चले जाने की प्रेरणा करूँ। उसे इसकी जरा भी चिंता न थी कि इस अबला का भविष्य क्या होगा। उसका निर्वाह कैसे होगा,
हो गई है। अगर घड़ी भर भी घर से बाहर रहूँ, तो जवाब-तलब होने लगे। सिनेमा रोज जाता हूँ और रोज घंटों मनावन करनी पड़ती है।'
कमलाप्रसाद - 'वाह वाह! यह तो तुमने खूब कही। कसम अल्लाह पाक की, खूब कही। जिस कल वह बिठाए, उस कल बैठ जाऊँ? फिर झगड़ा ही न हो, क्यों? अच्छी बात है। कल दिन भर घर से निकलूँगा ही नहीं, देखूँ तब क्या कहती है। देखा, अब तक लौंडा केसर और केवड़ा ले कर नहीं लौटा। कान में भनक पड़ गई होगी, प्रेमा को मना